जीवन प्रवाह है प्रेरक कहानी (अवधेशानंद गिरी)

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जीवन प्रवाह है प्रेरक कहानी अवधेशानंद गिरी मानव जीवन तीन धरातलों पर जिया जा सकता है – पाशविक, मानवीय, एवम् दैवीय| पाशविक धरातल पर तो हम सभी जीते हैं, पर हममें से कुछ ऐसे भी है जो मानवीय धरातल पर जीने का प्रयास करते हैं| अर्थात् जीवन में कुछ कर गुज़रना चाहते हैं| ऐसे व्यक्ति किसी न किसी क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ने का प्रयास करते हैं| दैवीय धरातल तक अपने को उठाने वाले गिने-चुने ही होते है| वे सद्गुणों के धनी होते हैं, इंसानियत की मिसाल बनते हैं और सबके काम आने का एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं| सही अर्थ में मानव वही है जो पाशविक से मानवीय तथा मानवीय से दिव्य धरातल की और अग्रसर होने का प्रयास करता हैं|

जीवन प्रवाह का नाम है, ठहराव का नहीं| जीवन के प्रवाह को बेहतरी की दिशा में ले जाने में ही हमरी सफलता है| सिर्फ भौतिक बेहतरी ही नहीं बल्कि आत्मिक भी| बेहतरी की डगर घाटी से छोटी की और ले जाती है| इसके तीन सोपान हैं- आत्म पहचान, आत्म अनुष्ठान और आत्मोत्थान| आत्म पहचान का अर्थ है अपने स्वाभावगंत गुण का ध्यान| हम बहुधा दूसरों को पहचानने में लगे रहते हैं, अपने को नहीं| पर ये दुनिया उसको पहचानती है जो स्वयं को पहचान पाता है| एक शायर ने सही कहा है- “ज़माने में उसने बड़ी बात कर ली, अपने से जिसने मुलाकात कर ली|” हमारे शाश्त्रो में भी कहा गया है- यस्य नास्ति आत्म प्रज्ञा शास्त्रः तस्य करोति किम, लोचनाभ्याम विहीनस्य दर्पणः किम प्रयोजनम|
अर्थात जिसे आत्मज्ञान नहीं होता, उसका शास्त्रों का ज्ञान बेकार है| जैसे कि नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है| आज तो विज्ञान भी अपने ऐटीट्यूड को पहचानने पर जोर दे रहा है|
दूसरा सीढ़ी है- आत्म अनुष्ठान| इसका अर्थ है अपने स्वभावगत गुण को निखारने के लिए प्रयास करना| इसके लिए अभ्यास जरूरी है| यह मानव स्वभाव है की हम आरामतलब जिंदगी जीना चाहते हैं और मेहनत से कतराते हैं| पर अपने गुणों को तराशने के लिए परिश्रम आवश्यक है| मेहनत का कोई विकल्प नहीं है अतः अपने गुणों में निपुणता लाने के लिए कर्मनिष्ठा जरुरी है|

तीसरी और अंतिम सीढ़ी है- आत्मोत्थान| यानी अपने को ऊँचे से ऊँचा उठाना| इसके लिए जीवन में ऊँचा लक्ष्य साधने की आवश्यकता है| यह वही कर सकता हाउ जो अनुभव से जीने की कोशिश करता है| हम सामान्यतः आदत से जीते हैं, अनुभव से नहीं| जो अनुभव से सीखकर जिंदगी को सँवारता है, वह बेहतरी के मार्ग पर चल पड़ता है| इंसानियत के चार मुख्य गुण हैं- सात्विक सोच, सुभाषिता, सदाचार और परोपकार| इन गुणों से मुक्त व्यक्ति को ही हम देवतुल्य कहते हौं| इस मार्ग पर आगे बढ़े और अपना जीवन सार्थक बनाये|

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